Tuesday, December 6, 2011
Thursday, November 3, 2011
Tuesday, March 29, 2011
मेरा भारत महान
मेरे देश का हर नेता चाहता है,
कि तुम भगत और आजाद बनो.
ताकि जवानी में ही तुम्हें
गोलियों से भून दिया जाऐ .
या
देश द्रोह के आरोप में
फाँसी पर लटका दिया जाऐ.
और
यह नेता नामक जीव
आराम से अपनी जेबें भरे
टेक्स का भार
निरीह जनता के माथे पर धरे.
इसीलिऐ
मेरे दोस्त ,
इन तथाकथित नेताओं की
मत सुनो
इनके लिऐ फाँसी के फन्दे को
मत चुनों.
अब कुछ ऐसा करो
जो इनके चेहरे से नकाब हट जाऐ
और फिर से
मेरा भारत महान कहलाऐ .
Saturday, September 25, 2010
Sunday, January 3, 2010
सरकारी दफ्तर //व्यंग्य
सरकारी दफ्तर
_________________
जी हाँ यह सरकारी दफ्तर है
यहाँ का प्रत्येक कर्मचारी अफसर है
दफ्तर के मुख्य द्वार पर
दो सीढ़ी पार कर
कभी- कभी मिलेगा
एक ऊँघता हुआ प्राणी
कहने को यह
चतुर्थश्रेणी कर्मचारी है
फिर भी प्रथम है.
इसी के पास है
दफ्तर की चाबी
कुछ भी कराना हो
इसके पास जाइऐ
मुट्ठी गर्म कीजिऐ
और रास्ता पूछ जाइऐ .
यह सब समझा देगा
आपको धीरे से बतला देगा
फाइल में बीस का नोट दबाओ
सामने वाली टेबल पर चले जाओ
फिर कोने वाले के पास जाना
फाइल में पचास का नोट दबाना
और चुपचाप खडे हो जाना
आपको
कुछ कहने की आवश्यकता नहीं
वे सब संभाल लेगें
आपको
फाइल सहित ऊपर वाले कमरे में
पहुँचा देगें.
वहाँ सो का नोट रखना
वे हस्ताक्षर कर देगें.
यदि कहें कल आना
तो समझना
काम उनकी सीमा से बाहर है
फाइल अभी आगे बढ़ानी है
फाइल का थोडा वजन बढाओ
दूसरे दिन फाइल सुरक्षित ले जाओ .
आप कहेंगे,
कल क्यों..?
क्योंकि यहाँ के जो अफसर हैं
उनके घर पर ही दफ्तर हैं
अधिकांश काम
वे घर पर ही निपताते हैं
यहाँ तो मात्र
अधिकारी होने का
आभास दे जात हैं.
आप सोचते होंगे
यह तो सरासर
रिश्वतखोरी है
जी नहीं
बेचारे ईमानदारी से
कर्तव्य निभाते हैं
तभी तो
फाइलों में बडे-बडे बाँध
मगर जमीन पर
झोंपडे नजर आते हैं
करोडों का विकास
फाइलों में होता है
और बाढ़ में बह जाता है
लेकिन जनता के हिस्से का
विकास लकीरों में रह जाता है
और इनके बैंक बेलेंस का बोझ
बढ़ता ही जाता है ॥
डॉ. योगेन्द्र मणि
_________________
जी हाँ यह सरकारी दफ्तर है
यहाँ का प्रत्येक कर्मचारी अफसर है
दफ्तर के मुख्य द्वार पर
दो सीढ़ी पार कर
कभी- कभी मिलेगा
एक ऊँघता हुआ प्राणी
कहने को यह
चतुर्थश्रेणी कर्मचारी है
फिर भी प्रथम है.
इसी के पास है
दफ्तर की चाबी
कुछ भी कराना हो
इसके पास जाइऐ
मुट्ठी गर्म कीजिऐ
और रास्ता पूछ जाइऐ .
यह सब समझा देगा
आपको धीरे से बतला देगा
फाइल में बीस का नोट दबाओ
सामने वाली टेबल पर चले जाओ
फिर कोने वाले के पास जाना
फाइल में पचास का नोट दबाना
और चुपचाप खडे हो जाना
आपको
कुछ कहने की आवश्यकता नहीं
वे सब संभाल लेगें
आपको
फाइल सहित ऊपर वाले कमरे में
पहुँचा देगें.
वहाँ सो का नोट रखना
वे हस्ताक्षर कर देगें.
यदि कहें कल आना
तो समझना
काम उनकी सीमा से बाहर है
फाइल अभी आगे बढ़ानी है
फाइल का थोडा वजन बढाओ
दूसरे दिन फाइल सुरक्षित ले जाओ .
आप कहेंगे,
कल क्यों..?
क्योंकि यहाँ के जो अफसर हैं
उनके घर पर ही दफ्तर हैं
अधिकांश काम
वे घर पर ही निपताते हैं
यहाँ तो मात्र
अधिकारी होने का
आभास दे जात हैं.
आप सोचते होंगे
यह तो सरासर
रिश्वतखोरी है
जी नहीं
बेचारे ईमानदारी से
कर्तव्य निभाते हैं
तभी तो
फाइलों में बडे-बडे बाँध
मगर जमीन पर
झोंपडे नजर आते हैं
करोडों का विकास
फाइलों में होता है
और बाढ़ में बह जाता है
लेकिन जनता के हिस्से का
विकास लकीरों में रह जाता है
और इनके बैंक बेलेंस का बोझ
बढ़ता ही जाता है ॥
डॉ. योगेन्द्र मणि
Wednesday, December 30, 2009
फिर एक बार // कविता
फिर एक बार
_________
आओ....
बदल डालें दीवार पर
लटके कलेन्डर
फिर एक बार,
इस आशा के साथ
कि-
शायद इसबार हमें भी मिलेगा
अफसर का सद व्यवहार
नेता जी का प्यार
किसी अपने के द्वारा
नव वर्ष उपहार.
सारे विरोधियों की
कुर्सियां हिल जाऐं
मलाईदार कुर्सी
अपने को मिल जाऐ.
सुरसा सी मँहगाई
रोक के क्या होगा ?
चुनावी मुद्दा है
अपना भला होगा .
जनता की क्यों सोचें ?
उसको तो पिसना है
लहू बन पसीना
बूँद-बूँद रिसना है
रिसने दो, देश-हित में
बहुत ही जरूरी है
इसके बिन सब
प्रगति अधूरी है.
प्रगति के पथ में
एक साल जोड दो
विकास का रथ लाकर
मेरे घर पे छोड दो.
बदल दो कलेन्डर
फिर एक बार
आगत का स्वागत
विगत को प्रणाम
फिर एक बार......!!
डॉ.योगेन्द्र मणि
_________
आओ....
बदल डालें दीवार पर
लटके कलेन्डर
फिर एक बार,
इस आशा के साथ
कि-
शायद इसबार हमें भी मिलेगा
अफसर का सद व्यवहार
नेता जी का प्यार
किसी अपने के द्वारा
नव वर्ष उपहार.
सारे विरोधियों की
कुर्सियां हिल जाऐं
मलाईदार कुर्सी
अपने को मिल जाऐ.
सुरसा सी मँहगाई
रोक के क्या होगा ?
चुनावी मुद्दा है
अपना भला होगा .
जनता की क्यों सोचें ?
उसको तो पिसना है
लहू बन पसीना
बूँद-बूँद रिसना है
रिसने दो, देश-हित में
बहुत ही जरूरी है
इसके बिन सब
प्रगति अधूरी है.
प्रगति के पथ में
एक साल जोड दो
विकास का रथ लाकर
मेरे घर पे छोड दो.
बदल दो कलेन्डर
फिर एक बार
आगत का स्वागत
विगत को प्रणाम
फिर एक बार......!!
डॉ.योगेन्द्र मणि
Monday, December 28, 2009
शान्ता क्लोज़
शान्ता क्लोज़ ने
दरवाजा खटटाया
छुट्टी के दिन भी सुबह-सुबह
आठ बजे ही आ जगाया
बोला
आँख फाडकर क्या देखता है
मुझे पहिचान
जो भी चाहिऐ माँग .
हम बडबडाऐ-
सुबह-सुबह क्यों दिल्लगी करते हो
किसी दूसरे दरवाजे पर जाओ
सरकारी छुट्टी है ,सोने दो
तुम भी घर जाकर सो जाओ.
वह हमारी समझदारी पर मुस्कराया
पुनः आग्रह भरी निगाहों का
तीर चलाया।
हामने भी सोच -
चलो आजमाते हैं
बाबा कितने पानी में
पता लगाते हैं.
हम बोले -
बाबा, हमारा ट्रान्सफर
केंसिल कर दो
मंत्री जी के कान में
कोई ऐसा मंत्र भर दो
जिससे उनको लगे
हम उनके वफादार हैं
सरकार के सच्चे पहरेदार हैं.
वो मुस्कराया-
यह तो राजनैतिक मामला है
हम राजनीती में टांग
नहीं फसाते
नेताओं की तरह
चुनावी आश्वासन
नही खिलाते
कुछ और माँगो.
हम बोले ठीक है-
बेटे की नौकरी लगवादो
घर में जवान बेटी है
बिना दहेज के
सस्ता सुन्दर टिकाऊ
दामाद दिलवादो
मंहगाई की धार
जेब को चीरकर
सीने के आरपार
हुई जाती है
धनिया के पेट की
बलखाति आँतों को
छिपाने की कोशिश में
तार-तार हुई कमीज भी
शरमाती है
नरेगा योजना में
उसका नाम भी है
रोजगार भी है
भुगतन भी होता है
लेकिन उसकी मेहनत का
पूरा भुगतान
उसकी जेब तक पहुँचा दो.
वृद्धाश्रमों की चोखट पर
जीवन के अंतिम पडाव की
इन्तजार में
आँसू बहाते
बूढे माँ-बाप की औलादों के
सीने में
थोडा सा प्यार जगा दो
एक दिन चाकलेट खिलाकर
बच्चों को क्या बहलाते हो
मुफ्त में सोई इच्छाओं को
क्यों जगाते हो ?
वह सकपकाया-
सब कुछ समझते हुऐ भी
कुछ नहीं समझ पाया
लेकिन हम समझ गये-
यह भी किसी संभ्रांत पति की
तरह लाचार है
या मेरे
जावान बेटे की तरह
बेरोजगार है
हो सकता है
यह भी हो
मेरे देश की तरह
महामारी का शिकार
या फिर इसकी झोली को
मिलें हों सीमित अधिकार.
वैसे भी हमारा देश
त्योहारों का देश है
पेट भरा हो या खाली
कितनी भी भारी हो
जेबों पर कंगाली
हर त्योहार देश की शान है
मेरा देश शायद
इसीलिऐ महान है ॥
डॉ. योगेन्द्र मणि
दरवाजा खटटाया
छुट्टी के दिन भी सुबह-सुबह
आठ बजे ही आ जगाया
बोला
आँख फाडकर क्या देखता है
मुझे पहिचान
जो भी चाहिऐ माँग .
हम बडबडाऐ-
सुबह-सुबह क्यों दिल्लगी करते हो
किसी दूसरे दरवाजे पर जाओ
सरकारी छुट्टी है ,सोने दो
तुम भी घर जाकर सो जाओ.
वह हमारी समझदारी पर मुस्कराया
पुनः आग्रह भरी निगाहों का
तीर चलाया।
हामने भी सोच -
चलो आजमाते हैं
बाबा कितने पानी में
पता लगाते हैं.
हम बोले -
बाबा, हमारा ट्रान्सफर
केंसिल कर दो
मंत्री जी के कान में
कोई ऐसा मंत्र भर दो
जिससे उनको लगे
हम उनके वफादार हैं
सरकार के सच्चे पहरेदार हैं.
वो मुस्कराया-
यह तो राजनैतिक मामला है
हम राजनीती में टांग
नहीं फसाते
नेताओं की तरह
चुनावी आश्वासन
नही खिलाते
कुछ और माँगो.
हम बोले ठीक है-
बेटे की नौकरी लगवादो
घर में जवान बेटी है
बिना दहेज के
सस्ता सुन्दर टिकाऊ
दामाद दिलवादो
मंहगाई की धार
जेब को चीरकर
सीने के आरपार
हुई जाती है
धनिया के पेट की
बलखाति आँतों को
छिपाने की कोशिश में
तार-तार हुई कमीज भी
शरमाती है
नरेगा योजना में
उसका नाम भी है
रोजगार भी है
भुगतन भी होता है
लेकिन उसकी मेहनत का
पूरा भुगतान
उसकी जेब तक पहुँचा दो.
वृद्धाश्रमों की चोखट पर
जीवन के अंतिम पडाव की
इन्तजार में
आँसू बहाते
बूढे माँ-बाप की औलादों के
सीने में
थोडा सा प्यार जगा दो
एक दिन चाकलेट खिलाकर
बच्चों को क्या बहलाते हो
मुफ्त में सोई इच्छाओं को
क्यों जगाते हो ?
वह सकपकाया-
सब कुछ समझते हुऐ भी
कुछ नहीं समझ पाया
लेकिन हम समझ गये-
यह भी किसी संभ्रांत पति की
तरह लाचार है
या मेरे
जावान बेटे की तरह
बेरोजगार है
हो सकता है
यह भी हो
मेरे देश की तरह
महामारी का शिकार
या फिर इसकी झोली को
मिलें हों सीमित अधिकार.
वैसे भी हमारा देश
त्योहारों का देश है
पेट भरा हो या खाली
कितनी भी भारी हो
जेबों पर कंगाली
हर त्योहार देश की शान है
मेरा देश शायद
इसीलिऐ महान है ॥
डॉ. योगेन्द्र मणि
Subscribe to:
Posts (Atom)



