Wednesday, January 3, 2018

                बिछड़ों के मुख पर मुस्कान,अपनाघर की नई पहचान

                                       
                                                   

     अपनाघर आश्रम कोटा, जो कि लावारिस मानसिक विमंदितों का एक पुनर्वास गृह है ,आजकल मानसिक विमंदितों की सेवा का पुनीत कार्य तो किया ही जा रहा है साथ ही जो आश्रम के सेवाभावी सेवाकर्मियों के प्यार ,चिकित्सा एवं सेवा से यहाँ रहने वाली विमंदित महिलाओं ,जिन्हें प्रभु जी कहा जाता है ,के स्वस्थ होने पर अपने धर परिवार के विषय में जानकारी प्राप्त कर उन्हें उनके परिवार से मिलाने का नेक कार्य भी  किया जा रहा हैा
       कोटा में यह आश्रम 22जनवरी 2012 में नारी निकेतन नान्ता के परिसर में अस्थाई रुप से प्रारम्भ हुआ था। जहाँपर लावारिस विमंदित महिलाओं को आश्रय देने के साथ ही उनकी देखभाल एवं सेवा-चिकित्सा का कार्य प्रारम्भ किया गया और घीरे घीरे इन महिला प्रभुजी की संख्या पचास को पार कर गयी। आश्रम केे संस्थापक डा बी एम भारद्वाज एवं  संयोजक राजेश शर्मा तथा अपनाघर की कार्यकारिणी के प्रयास से राजकीय पोलीटेक्निक कालेज के जीर्णशीर्ण पड़े होस्टल को राज्य सरकार से नियमानुसार लेकर जनसहयोग से इसका कायाकल्प किया गया।कोटा में अपनाघर आश्रम की  स् थापना के ठीक पाँच साल बाद 22जनवरी 2017को पोलीटेक्निक कालेज के होस्टल के परिसर में स् थानान्तरित किया गया। इसके इस नये भवन में प्रारम्भ करने के समय यहाँ लगभग 60 महिला प्रभुजी रह रही थी,जिनकी संख्या अब बढ़कर 100 को पार कर रही है।
               अपनाघर आश्रम में इन बेसहारा लोगों की सेवा का कार्य मुख्यरुप से वहाँके सेवाकर्मी बड़े ही समर्पण भाव से करते हैं।जिसका ही परिणाम है कि इस वर्ष जनवरी 2017से दिसम्बर माह तक 60 महिला प्रभुजी जोकि यहाँ उपलब्ध चिकित्सा के परिणाम स्वरुप अपनी पारिवारिक जानकारी देने में सक्षम हो सकी।इन महिला प्रभु जी से प्राप्त जानकारी के आधार पर ंअपनाघर आश्रम द्वारा खोजबीन कर उनके परिवारों को खेाजा गया। किसी के परिवार को खोजना वास्तव में एक कठिन कार्य है। वह भी तब ,जबकि पाँच-छः वर्षों से किसीके परिवार के विषय में कोई जानकारी ही नहीं हो। कुछके परिजन तो यह सोच चुके थे कि उनके परिवार का सदस्य अब इस दुनिया में ही नहीं है।
                 ऐसेमें अपनाघर आश्रम से जुड़े दो युवा ऊर्जावान सेवाकर्मी अब्दुल कादिर और सुरभि वर्मा, जोकि प्रभुजनों की चिकित्सा सेवा कार्य तो करते ही हैं साथ ही उनके स्नेहिल व्यवहार से कुछ प्रभुजन इस स्थिति में आ सके कि वे अपने परिवार के बारे में जानकारी दे पाये। अब्दुल कादिर और सुरभि ने उनके परिवारों से सम्पर्क कर यह सुनिश्चित किया कि उनके द्वारा बताई जानकारी वास्तव में सही है।
        इन दोनों सेवासाथियों ने मध्यप्रदेश की गंगाबाई,सुनीता,रामकिशोर और देवली को उनके परिवारों से मिलाया तो बिहार की सुलेखा और लाली को उनके परिवार से मिलाया।वहीं उत्तर प्रदेश की सरिता,सोनुदेवी,गुड़िया,और गीता कोउनके परिवार तक पहुँचाया।
        7 नवम्बर 2013 से आश्रम में रह रही मुमताज जो कि शाहपुरा निवासी है 6वर्षों से मानसिक स्थिति सही नहीं होने के कारण परिवार से बिछड़ गयी थी गत दिनों उनके पति और पुत्र
को सूचना देने पर वे आश्रम आये तो पति और पुत्र से मिलन का दृष्य वास्तव में इतना मार्मिक हो गया था कि सभी की आँखे नम हो गयी थी।
        विगत चार साल में यहाँ रह रही मुमताज वास्तव म ेंअपना घर के परिवार की सदस्य ही थी जिसके जाने पर एक तरफ विछोह का दुख तो दूसरी ओर खुशी भी थी कि वह छः साल बाद अपने परिवार के साथ जा रही थी।
     इसी प्रकार दक्षिण भारत त्रिची की मरियम और हैदराबाद की श्रीलक्ष्मी को परिवार से मिलाया।अहिन्दी भाषी क्षेत्र के प्रभु जी के साथ कभी कभी भाषा की परेशानी आती है लेकिन उनकी  भाषा की जानकारी रखने वाले लोगों के माघ्यम से प्रभुजनेंा की बात समझने का प्रयास किया जाता है।इनके साथ ही राजस्थान की किरण,सुलेखा,वसुन्धरा,रीना,कोमल,कान्तीबाई,मोनिका के अतिरिक्त अविनाश,रामकिशन,राकेश,राजू अब्दुल मुकेंश आदि कुल 60 प्रभुजी को इस सााल उनके परिवार वाले ले गये। लेकिन अभी भी अपनाघर में 6प्रभु जी भवानी,उर्मिला,संजु,संगीता,संतोष सुमन जो उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश तथा कोटा के ऐसे हैं जिन्हें उनके परिवार वालों ने अपनाने से इन्कार कर दिया।मगर अपनाघर आश्रम मन से ऐसे सभी मानसिक विमंदित,असहाय,लावारिस लोगों को सहारा देने में कभी पीछे नहीं हटने का संकल्प लिए निरन्तर सभीको गले लगाकर अपनाता रहेगा।


                                                    डा योगेन्द्र म्णि कौशिक
                                                         सचिव
                                                  अपनाघर आश्रम सेवासमिति,कोटा
                                         पताः 1/256 गणेश तालाब,कोटा 324009
                                           
                                                 मो0 9352612939  

Tuesday, January 1, 2013



गम के दरिया में कभी, डुबकी लगाके देखिये।
आते जाते ही सही,दिल से लगाके देखिये ।।


जिनकी रोज़ाना दिवाली,उनकी बातें क्या करें।
ढण्डे चूल्हे आग को तरसें, जलाके देखिये ।।


जड़ दिया ताला,कहा कि मिल में घाटा हो गया।
बर्फ सूनी आंख के, आंसू गला के देखिये।।


उनकी फितरत है ,चुभोयेगें यंू ही नश्तर सदा।
बहते नासूरों पे कुछ ,मरहम लगाके देखिये।।


आये बैठे कर गये अफसोस उनका फर्ज था।
गर्द दिल में जो जमी, उसको हटाके देखिये।

Friday, January 27, 2012

Monday, January 2, 2012

नव वर्ष...

नव वर्ष की शुभकामनाओं के साथ...
आओ फिर एक बार
इस आशा के साथ जिऐं
कि शायद,
मँहगाई की मार से मिल जाये निजात
घी,तेल शक्कर बार-बार नहीं दिखाऐं दॉत.
शायद,
देश के कर्णधारों को ,आ जाऐ सदबुद्धि
किसी तरह हो जाऐ उनकी आत्म शुद्धि
भ्रष्टाचार से जन की लडाई
सत्तामद की,टूटेगी तानाशाही
रोटी की चिन्ता में जन-जन बेहाल
शायद, ढूंढ लाऐ कोई जन का जन पाल ॥

डॉ.योगेन्द्र मणि

Monday, December 12, 2011

fatahsagar udaipur rajasthan

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अन्ना नहीं ये आँधी है
बिन लाठी का गाँधी है
भ्रष्ट्राचार पे लगेगा अंकुश
सबने आशा बाँधी है ॥
गाँधी ने स्वराज दिलाया
हमें लगा सुराज है आया
हर हाथों को काम मिलेगा
नेकी का ईनाम मिलेगा
हर घर में खुशियां बोयेगें
भूखे न बच्चे सोऐगें
खेतों में खुशहाली होगी
हर घर में दीवाली होगी
सपनों में अब तक जीते थे
प्यास लगी आँसू पीते थे
जनसेवक बन गये शासक
जनता उनकी बाँदी है
भ्रष्ट्राचार पे लगेगा अंकुश
सबने आशा बाँधी है ॥

Tuesday, December 6, 2011

Thursday, November 3, 2011

Tuesday, March 29, 2011

मेरा भारत महान



मेरे देश का हर नेता चाहता है,
कि तुम भगत और आजाद बनो.
ताकि जवानी में ही तुम्हें
गोलियों से भून दिया जाऐ .
या
देश द्रोह के आरोप में
फाँसी पर लटका दिया जाऐ.
और
यह नेता नामक जीव
आराम से अपनी जेबें भरे
टेक्स का भार
निरीह जनता के माथे पर धरे.
इसीलिऐ
मेरे दोस्त ,
इन तथाकथित नेताओं की
मत सुनो
इनके लिऐ फाँसी के फन्दे को
मत चुनों.
अब कुछ ऐसा करो
जो इनके चेहरे से नकाब हट जाऐ
और फिर से
मेरा भारत महान कहलाऐ .

Sunday, January 3, 2010

सरकारी दफ्तर //व्यंग्य

सरकारी दफ्तर
_________________

जी हाँ यह सरकारी दफ्तर है
यहाँ का प्रत्येक कर्मचारी अफसर है

दफ्तर के मुख्य द्वार पर
दो सीढ़ी पार कर
कभी- कभी मिलेगा
एक ऊँघता हुआ प्राणी
कहने को यह
चतुर्थश्रेणी कर्मचारी है
फिर भी प्रथम है.

इसी के पास है
दफ्तर की चाबी
कुछ भी कराना हो
इसके पास जाइऐ
मुट्ठी गर्म कीजिऐ
और रास्ता पूछ जाइऐ .

यह सब समझा देगा
आपको धीरे से बतला देगा
फाइल में बीस का नोट दबाओ
सामने वाली टेबल पर चले जाओ

फिर कोने वाले के पास जाना
फाइल में पचास का नोट दबाना
और चुपचाप खडे हो जाना
आपको
कुछ कहने की आवश्यकता नहीं
वे सब संभाल लेगें
आपको
फाइल सहित ऊपर वाले कमरे में
पहुँचा देगें.
वहाँ सो का नोट रखना
वे हस्ताक्षर कर देगें.

यदि कहें कल आना
तो समझना
काम उनकी सीमा से बाहर है
फाइल अभी आगे बढ़ानी है
फाइल का थोडा वजन बढाओ
दूसरे दिन फाइल सुरक्षित ले जाओ .


आप कहेंगे,
कल क्यों..?
क्योंकि यहाँ के जो अफसर हैं
उनके घर पर ही दफ्तर हैं
अधिकांश काम
वे घर पर ही निपताते हैं
यहाँ तो मात्र
अधिकारी होने का
आभास दे जात हैं.


आप सोचते होंगे
यह तो सरासर
रिश्वतखोरी है
जी नहीं
बेचारे ईमानदारी से
कर्तव्य निभाते हैं
तभी तो
फाइलों में बडे-बडे बाँध
मगर जमीन पर
झोंपडे नजर आते हैं
करोडों का विकास
फाइलों में होता है
और बाढ़ में बह जाता है
लेकिन जनता के हिस्से का
विकास लकीरों में रह जाता है
और इनके बैंक बेलेंस का बोझ
बढ़ता ही जाता है ॥

डॉ. योगेन्द्र मणि

Wednesday, December 30, 2009

फिर एक बार // कविता

फिर एक बार
_________


आओ....
बदल डालें दीवार पर
लटके कलेन्डर
फिर एक बार,

इस आशा के साथ
कि-
शायद इसबार हमें भी मिलेगा
अफसर का सद व्यवहार
नेता जी का प्यार
किसी अपने के द्वारा
नव वर्ष उपहार.

सारे विरोधियों की
कुर्सियां हिल जाऐं
मलाईदार कुर्सी
अपने को मिल जाऐ.

सुरसा सी मँहगाई
रोक के क्या होगा ?
चुनावी मुद्दा है
अपना भला होगा .

जनता की क्यों सोचें ?
उसको तो पिसना है
लहू बन पसीना
बूँद-बूँद रिसना है

रिसने दो, देश-हित में
बहुत ही जरूरी है
इसके बिन सब
प्रगति अधूरी है.

प्रगति के पथ में
एक साल जोड दो
विकास का रथ लाकर
मेरे घर पे छोड दो.

बदल दो कलेन्डर
फिर एक बार
आगत का स्वागत
विगत को प्रणाम
फिर एक बार......!!

डॉ.योगेन्द्र मणि

Monday, December 28, 2009

शान्ता क्लोज़

शान्ता क्लोज़ ने
दरवाजा खटटाया
छुट्टी के दिन भी सुबह-सुबह
आठ बजे ही आ जगाया
बोला
आँख फाडकर क्या देखता है
मुझे पहिचान
जो भी चाहिऐ माँग .

हम बडबडाऐ-
सुबह-सुबह क्यों दिल्लगी करते हो
किसी दूसरे दरवाजे पर जाओ
सरकारी छुट्टी है ,सोने दो
तुम भी घर जाकर सो जाओ.
वह हमारी समझदारी पर मुस्कराया
पुनः आग्रह भरी निगाहों का
तीर चलाया।

हामने भी सोच -
चलो आजमाते हैं
बाबा कितने पानी में
पता लगाते हैं.

हम बोले -
बाबा, हमारा ट्रान्सफर
केंसिल कर दो
मंत्री जी के कान में
कोई ऐसा मंत्र भर दो
जिससे उनको लगे
हम उनके वफादार हैं
सरकार के सच्चे पहरेदार हैं.

वो मुस्कराया-
यह तो राजनैतिक मामला है
हम राजनीती में टांग
नहीं फसाते
नेताओं की तरह
चुनावी आश्वासन
नही खिलाते
कुछ और माँगो.

हम बोले ठीक है-
बेटे की नौकरी लगवादो
घर में जवान बेटी है
बिना दहेज के
सस्ता सुन्दर टिकाऊ
दामाद दिलवादो
मंहगाई की धार
जेब को चीरकर
सीने के आरपार
हुई जाती है
धनिया के पेट की
बलखाति आँतों को
छिपाने की कोशिश में
तार-तार हुई कमीज भी
शरमाती है
नरेगा योजना में
उसका नाम भी है
रोजगार भी है
भुगतन भी होता है
लेकिन उसकी मेहनत का
पूरा भुगतान
उसकी जेब तक पहुँचा दो.


वृद्धाश्रमों की चोखट पर
जीवन के अंतिम पडाव की
इन्तजार में
आँसू बहाते
बूढे माँ-बाप की औलादों के
सीने में
थोडा सा प्यार जगा दो

एक दिन चाकलेट खिलाकर
बच्चों को क्या बहलाते हो
मुफ्त में सोई इच्छाओं को
क्यों जगाते हो ?

वह सकपकाया-
सब कुछ समझते हुऐ भी
कुछ नहीं समझ पाया

लेकिन हम समझ गये-
यह भी किसी संभ्रांत पति की
तरह लाचार है
या मेरे
जावान बेटे की तरह
बेरोजगार है
हो सकता है
यह भी हो
मेरे देश की तरह
महामारी का शिकार
या फिर इसकी झोली को
मिलें हों सीमित अधिकार.

वैसे भी हमारा देश
त्योहारों का देश है
पेट भरा हो या खाली
कितनी भी भारी हो
जेबों पर कंगाली
हर त्योहार देश की शान है
मेरा देश शायद
इसीलिऐ महान है ॥


डॉ. योगेन्द्र मणि

Friday, December 4, 2009

जाने क्यों आज हम खलने लगे हैं....

जाने क्यों आज हम खलने लगे हैं
अब वो मुँह फेर कर चलने लगे हैं।

उनसे शिकवा भी क्या करें यारों
साँप आस्तीन में पलने लगें हैं ।

जब से सच को ही सच कहा हमनें
मूँग छाती पे वो दलने लगे हैं ।

ऊँची कुर्सी का कैसा जादू है
रिश्ते सब बर्फ से गलने लगे हैं ।

दूध से गर जले हों चर्चा करें
अब तो वे छाछ से जलने लगे हैं ॥


डॉ. योगेन्द्र मणि

Friday, November 27, 2009

मैं भी पी लूँ

मैं भी पी लूँ
_____________
वे पीते हैं , मैं भी पी लूँ
सोचा था ऐसे ही जी लूँ
मेरी जान की दुश्मन दुनिया
यूँ ही कब जीने देती है
चुपचाप कहाँ पीने देती है...?

प्याले से कोई मदिरालय में
कोई पीता देवालय में
ज्ञान की सरिता बहाने वाला
देखो पीता विद्यालय में

मंत्री मंत्रालय में पीता
कोई पीता सचिवालय में
चपरासी बाहर ही पीता
अफसर पीता कार्यालय में

सेठ चोर साहूकार दरोगा
नैनों ही नैनों से पीते
अबला की योवन रस गगरी
पीते देखे वैशालयों में

लेकिन मैनें भी पीना चाहा
नये सिरे से जीन चाहा
तुम बोल उठे कि मैं पीता हूँ
तुम सा ही जीवन जीता हूँ

रक्त रूप योवन और मदिरा
तुम पीते मैं कब पीता हूँ
जब भी हुआ विवाद
सदा ही तुम जीते मैं कब जीता हूँ

अपनी ही सूनी आँखों के
केवल अश्रु नीर पीता हूँ
खुशियों की छितराई गुदडी
गम की सूंई से सीता हूँ

सोचा था ऐसे ही जी लूँ

वे पीते हैं मैं भी पी लूँ....॥


डॉ. योगेन्द्र मणि

Tuesday, September 15, 2009

काव्य प्रेमी/व्यंग्य

काव्य -प्रेमी /व्यंग्य

एक काव्य प्रेमी हमारे पास आये
बोले
बन्धु कोई कविता सुनाओ
उनके काव्य प्रेम को देख
कविता की प्रसव पीडा ने हमें आन सताया
हमने श्रंगार की प्रथम डोज पिलाने के चक्कर में
चन्द्रमुखी नायिका के
गदराये यौवन वाली रचना सुनाई
उन्होंने तुरन्त टांग अडाई
तुम कौनसी सदी के कवि हो भाई
ऐसी रचनाऐं दसवीं के कोर्स में आती हैं
छात्रों को मीठे सपनें दिखाती हैं
तुम भी मीठे सपने दिखाने लगे
गदराऐ यौवन की बाते बताने लगे

शायद तुमने नहीं देखी
दहेज की आग में झुलसती हुई नवयौवनाऐं
सूखी छाती से चिपके दुध-मुँहे बच्चे
बूढे माँ-बाप की खातिर
यौवन के आगमन से बेखबर
ओफिस में कलम धिसति युवतियां

उनका तैंवर देख
गाँधी के तीन बन्दर की कविता सुनाई
वे भन्नाऐ-

बोले-
लगता है तुम
बन्दरों की सभ्यता का
जीता जागता नमूना हो
वैसे भी गाँधी की कविता तुमने क्यों सुनाई
क्या सारे नेता मर गऐ
और गाँधीवाद तुम्हारे नाम कर गऐ
अभी तो देश में नोटों की राजनीति जिन्दा है
जिससे गाँधी की आत्मा तक शर्मिन्दा है
क्यों दाल भात में मूसल चन्द बने जाते हो
दूसरी कविता क्यों नहीं सुनाते हो ?

हमने कहा
आजाद ,भगत या सुभाष की कविता सुनाऐ
वे बोले-
आखिर आप चाहते क्या हैं
क्या हम भी शहीद हो जाऐ ?
यदि आजाद,भगत या सुभाष की कविता सुनाओगे
तो शान्ती भंग करने के आरोप में
अन्दर हो जाओगे

हम झल्लाऐ-
आखिर आप चाहते क्या हैं...?
आप कहें तो हम आत्म हत्या कर जाऐं..?
बोले कर लो देश का भला होगा
ऐसी कविताओं से न जाने अब तक
कितनों को छला होगा
सुनानी ही है

तो कौमी एकता के गीत गाओ
आतंकवाद मिटाने में स्वर मिलाओ
मंहगाई के साथ दौड लगाने के गुर बताओ
सरकारी सूत्रीय कार्यक्रमों में
दो-चार सूत्र अपने भी जोड जाओ
सस्ते टी.वी और मोबाइल के सपने जगाओ

हम बोले भय्याजी-
जिनकी आँतों पर ताले पडे हों
आँखों में आंसू के समन्दर भरे हों
उन्हें सुत्रों की चादर कब तक उढाओगे
कडी मेहनत के नाम पर
कब तक तडफाओगे
जिनके सर पर न छप्पर
न पैरों में जूती
उनको क्या भैय्याजी
मोबाइल और टी.वी खिलाओगे ...??


डॉ. योगेन्द्र मणि

Monday, July 27, 2009

गीत

यूँ गुजरते रहे जाने कितने बरस
हम बहारों को ही ताकते रह गये
हुऐ दिन हवा जाने कब क्या हुआ
हम गुबारों को ही ताकते रह गये ॥

बरसों से टिकी आस पर सांस है
डिग्रियों की गले में पडी फांस है
आप रग रग में नश्तर चुभोते रहे
हम बीमारों को ही ताकते रह गये ॥

है मेरे गाँव की फाइलों में सड़क
बिन पानी गई सारी मिट्टी तिडक
झूंठी पत्तल में बचपन झगडता रहा
हम सितारों को ही ताकते रह गये ॥

आप पर तो रहा है खुदा का करम
सूखी आंते लगें जुल्फ के जैसे खम
आप सागर में मौजें मनाते रहे
हम किनारों को ही ताकते रह गये ॥

ख्वाब में हम धरोंदें बनाते रहे
ज़ख्म अपने ही खुद सहलाते रहे
खॊ गये आप जाने कहाँ खो गये
हम कतारों को ही ताकते रह गये ॥


डॉ. योगेन्द्र मणि

Monday, July 13, 2009

कुर्सी //व्यंग्य

कुर्सी

कुर्सी बहुत महान है
अफसर से वर्कर तक
नेता से अभिनेता तक
प्रत्येक प्राणी
इसका गुलाम है ॥

बड़ी कुर्सी के आगे
छोटी कुर्सी की साजिश
प्रायः नाकाम है ॥

राजनीतिक भाषा में
भारतीय परिभाषा
कुर्सी की प्रत्येक
टांग से चिपके हैं
करोड़ों अरमान ॥

कुछ सत्ता के बीमार
आदत से लाचार
कुर्सी की टांग खींचना है
जिनका नैतिक दायित्व
ताकि कुर्सी डगमगा जाऐ
कुर्सी वाला
जमीन पर आ जाऐ
और किसी भी तरह कुर्सी
अपने कब्जे में आ जाऐ ॥


डॉ. योगेन्द्र मणि

Wednesday, May 13, 2009

रघुपतिराघव राजा राम
______________________________


रघुपति राघव राजा राम, करदे सबका काम तमाम
सरपंच,एम.एल.ए.या एम.पी कुछ तो मुझे बना भगवान ॥
एक बार दिलवादे कुर्सी ,फिर सबकी करवा दूँ कुर्की
मुझको भी रोजगार मिलेगा,तेरा कारोबार चलेगा
जो भी आता तेरी गाता, चूंस-चूंस जनता को खाता
नेताओं के भारे गॊदाम,काम करें न एक छदाम
उसने सबको दिया है धोका, मुझको भी तो दे दे मौका
सब आश्वासन तेरे नाम,रघुपति राघव राजा राम....॥
गाँधी तेरा लेकर नाम,खूब किया जग में बदनाम
रिश्वत खोरों का है मोल, सच बोलो तो बिस्तर गोल
घोटालों पर जाँच का ताला, कुर्सी तेरा खेल निराला
कुर्सी मैय्या कुर्सी बाप,मन मैल पर कुर्ता साफ
पूरे कर मेरे अरमान, रघुपति राघव राजा राम....॥
अंधेर नगरी चोपट राजा, अब तो बजा दे उनका बाजा
खाया अब तक जितना उसने ,पूरा नहीं दिलादे आधा
भूख गरीबी और कंगाली जैसे नेता जी की साली
भूखे भजन न होय गोपाला, तेरी फसल खा गया लाला
अब तो सुन लो श्री भगवान, रघुपति राघव राजा राम....॥